
बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती द्वारा शनिवार 12 सितंबर को दिए गए एक बड़े बयान के बाद से यूपी के सियासी गलियारों में भारी हलचल है। मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने दोनों भतीजों (आकाश आनंद और ईशान आनंद) को पार्टी में कोई नई जिम्मेदारी नहीं देंगी। इसके साथ ही उन्होंने संकेत दिया है कि भविष्य में जरूरत पड़ने पर और कार्यक्षमता का आकलन करने के बाद वह अपनी भतीजी दीपिका आनंद को बसपा की कमान सौंप सकती हैं। इस ऐलान के बाद से सवाल उठ रहे हैं कि दीपिका कौन हैं और क्या वह 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से राजनीति में औपचारिक कदम रखेंगी।
कौन हैं दीपिका आनंद?
दीपिका आनंद बसपा सुप्रीमो मायावती के सबसे छोटे भाई आनंद कुमार की इकलौती बेटी हैं। 22 वर्षीय दीपिका वर्तमान में लंदन में कानून (Law) की पढ़ाई कर रही हैं। मायावती के परिवार से एक नया, शिक्षित और युवा चेहरा सामने आने के बाद अब पार्टी के कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें उन पर टिक गई हैं।
क्या यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से होगी राजनीति में धमाकेदार एंट्री?
साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मात्र एक सीट जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी के लिए 2027 का चुनाव अस्तित्व और वापसी के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। मायावती ने साफ संकेत दिए हैं कि बसपा संगठन में युवाओं को 50 प्रतिशत भागीदारी देने की तैयारी है और जेन-जी (Gen-Z) के युवाओं को टिकट वितरण में प्राथमिकता दी जाएगी।
चूंकि दीपिका खुद युवा हैं, इसलिए माना जा रहा है कि 2027 का यूपी चुनाव उनकी राजनीति में एंट्री के लिए सबसे माकूल अवसर हो सकता है। हालांकि, मायावती ने स्पष्ट किया है कि वह पहले अपनी भतीजी की जमीनी कार्यक्षमता और समर्पण को परखेंगी, उसके बाद ही कोई बड़ा फैसला लिया जाएगा।
दीपिका ने मना किया तो किसे मिलेगी कमान?
मायावती ने अपने बयान में पार्टी के भविष्य को लेकर दो प्रमुख बिंदु साफ किए हैं:
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परिवारवाद से दूरी: मायावती ने कहा कि उनके अविवाहित होने के कारण उनके भाई आनंद कुमार लंबे समय से उनकी देखभाल और पार्टी के कार्यों में सहयोग देते रहे हैं, लेकिन इसका लाभ उनके पूरे परिवार को मिलना आंदोलन के हित में नहीं है। यही वजह है कि दोनों भतीजों को कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी।
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गैर-पारिवारिक विकल्प: यदि दीपिका आनंद पार्टी की कमान संभालने या यह जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं होती हैं, तो बसपा की कमान परिवार से बाहर किसी अन्य समर्पित और मिशनरी दलित कार्यकर्ता को सर्वसम्मति से सौंपी जाएगी।












