
नई दिल्ली
चीनी सैनिकों ने फिर से लद्दाख में अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की और वर्षों बाद हवा में फायरिंग भी कर डाली। इस चीन की बौखलाहट कहें या फिर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा? इतिहास पलटकर देखने पर पता चलता है कि चीन ने भारत जैसे ताकतवर देश को प्रभावित करने वाला कोई भी सैन्य गतिविधि बौखलाहट में नहीं करता है। 1960 में चीन के तत्कालीन सर्वोच्च नेता माओ जेदॉन्ग (Mao Zedong) ने अपनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के सामने एक लक्ष्य रखा था जिसे पूरा करने का ख्वाब पीएलए अब भी देख रही है।
मोदी की छवि और भारतीय अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने की चाल
इसमें कोई शक नहीं कि चीन की दीर्घावधि योजना भारत को अस्थिर करने की है। इसके लिए वो 3,488 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव पैदा करता रहता है। उसे लगता है कि इससे भारत की राजनीति में उथल-पुथल मचेगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताकतवर छवि को नुकसान पहुंचेगा। दरअसल, चीन को लगता है कि कोविड-19 महामारी के कारण चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी 23 प्रतिशत से ज्यादा सिकुड़ गई है। ऐसे में सीमा पर तनाव बरकरार रखकर भारत का सैन्य खर्च बढ़ाया जा सकता है जिसका इकॉनमी पर और बुरा असर पड़ेगा।
उधर, उसे नियंत्रण रेखा (LOC) पर भी भारत को उलझाए रखने के लिए अपने सदाबहार दोस्त पाकिस्तान की मदद मिल ही रही है। चीन तो नेपाली सेना को भी भारत के खिलाफ खड़ा करने की भरपूर कोशिश कर रहा होगा, हालांकि इस मकसद में कामयाब होना बहुत मुश्किल है।
साउथ चाइना सी में खुद घिरा हुआ है चीन
इन परिस्थितियों में सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि क्या नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव हो जाने के बाद अमेरिका का चीन के प्रति रवैया नरम हो जाएगा? कम-से-कम चीन तो यही सोच रहा है। जिस तरह भारत को कई मोर्चों पर घेरने की कोशिश में है, उसी तरह साउथ चाइना सी में उसके खिलाफ अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे ताकतवर मुल्कों का मोर्चा खुला हुआ है।
लगातार उकसा रही है PLA
दरअसल, दक्षिण चीन सागर में चीन का प्रमुख शत्रु दुनिया का सुपरपावर अमेरिका है। वह ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में समर्थन देता है। वहीं, चीन ने जिसे अपना दूसरा बड़ा शत्रु मान रखा है, उस भारत से ताइवान ही नहीं चीन के शिंजियांग प्रांत की सीमा मिलती है। लद्दाख वो इलाका है जहां तीनों देशों की सीमा सटती है। पीएलए के महत्वाकांक्षी वेस्टर्न कमांड ने सोमवार को रेजांग ला (Rezang La) और रेचिन ला (Rechin La) रिज लाइन पर ताजा झड़प के लिए भले ही भारतीय सेना को जिम्मेदार बताया हो, लेकिन हकीकत यह है कि भारतीय सैनिकों ने पेंगोंग झील के दक्षिणी छोर पर पहुंचने की कोशिश कर रहे चीनी सैनिकों को रोकने के अलावा कुछ नहीं किया। भारतीय सैनिकों ने 29-30 अगस्त की रात को भी यही किया था।
SFF ने चीन को दिया गंभीर जख्म
चीनी सैनिकों के लगातार आक्रामक रुख का मकसद इतना तो साफ जरूर है कि अग्रिम मोर्चों पर तैनात भारतीय सैन्य कमांडर उसे बखूबी समझ रहे हैं। चीन इस बात से दुखी है कि भारत ने 29-30 अगस्त की रात को उसके सैनिकों को रोकने के लिए तिब्बतन शरणार्थियों से बने स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (SFF) को आगे किया। इस संघर्ष में एसएफएफ के जेसीओ न्यिमा तेनजिन (Nyima Tenzin) शहीद हो गए। इससे दुनियाभर में फैले तिब्बतियों के दिल में चीन के खिलाफ चिनगारी को हवा मिल गई। चीन इस बात से बहुत चिंतित है। ऊपर से एसएसएफ के जवानों की दिलेरी ने चीनियों को और चिंता में डाल दिया।














