
एक फिल्मी डायलॉग है, ‘ डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।‘ राजस्थान की राजनीति के संदर्भ में कहा जा सकता है कि ‘ गहलोत की राजनीति को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।‘ शायद सचिन पायलट के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। वो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के राजनीतिक पासों को पढ़ नहीं पाए और खुद की चाल में खुद ही फंस गए। राजस्थान कांग्रेस विधायक दल में जिस समर्थन का वो सपना पाले हुए थे, वो बिखर गए। आधा दर्जन ऐसे विधायक… जो घोषित तौर पर पायलट के कट्टर समर्थक माने जाते थे…
वो विधायक दल की बैठक में गहलोत के साथ पायलट के खिलाफ प्रस्ताव पारित करते नजर आए। अब हालात यह है कि राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के सबसे लंबे 6 साल तक अध्यक्ष रहे सचिन पायलट…. इस पद के साथ ही उप मुख्यमंत्री की कुर्सी भी गवां चुके हैं। वो अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा पाते हैं या नहीं… यह तो बाद की बात है, सबसे पहले तो उन्हें अपनी और अपने समर्थक 18 विधायकों की विधायकी बचाने की चुनौती से निपटना है।
ये बात तो किसी से छुपी नहीं थी कि राजस्थान में कांग्रेस सरकार के गठन के बाद से ही मुख्यमंत्री गहलोत और उप मुख्यमंत्री पायलट के बीच पटरी नहीं बैठ रही थी। मुख्यमंत्री की जिस कुर्सी पर वे अपना स्वाभाविक अधिकार मान रहे थे… वो उन्हें नहीं मिली। तो उसे पायलट पचा नहीं पा रहे थे। उनकी पीड़ा गहरे तक पैठ किये हुए थी। राजनीति में बोला कम… और किया ज्यादा जाता है। वो भी उचित अवसर आने का इंतजार करने के साथ। पायलट ने न उचित अवसर का इंतजार किया और न ही बोलने से चूके। वो गहलोत को मुख्यमंत्री पद से बेदखल करने के लिए खुद अवसर बनाने में जुट गए। इसके विपरीत गहलोत चतुर राजनीतिज्ञ की तरह पायलट की हर चाल को धैर्य से देखते रहे। उसका रिकॉर्ड तैयार कराते रहे। राज्यसभा चुनाव में पायलट अपना दांव खेल पाते… उससे ठीक पहले गहलोत ने भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप मढ़ कर एन्टी करप्शन ब्यूरो और एस ओ जी का पासा फेंक दिया। इससे उन्होंने न केवल पायलट के गहलोत विरोधी खेमे को मजबूत करने के इरादों को नाकाम कर दिया बल्कि भाजपा के दूसरे उम्मीदवार को जिताने के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया।
अब जब पायलट राजनीतिक प्रतिशोध के लिए गहलोत की सत्ता को चुनौती देने के लिए समर्थक विधायकों की बाड़ेबंदी कर रहे थे तो गहलोत ने वहां भी सेंध लगा दी। अपनी सरकार में वित्त और गृह मंत्री रहे प्रद्युम्न सिंह की मदद से उन चार युवा विधायकों को रातों-रात पायलट खेमा छोड़ने पर मजबूर कर दिया। ये चारों अगली सुबह मुख्यमंत्री निवास पर खड़े दिखे। ये थे प्रद्युम्न सिंह के पुत्र विधायक रोहित बोहरा, दानिश अबरार, चेतन डूडी और प्रशांत बैरवा। इसके साथ ही गहलोत आलाकमान को पायलट की उस हर हरकत से अवगत कराते रहे जो उनके खिलाफ चल रही थी। साथ ही इसके सबूत भी बताते रहे कि पायलट ये सब भाजपा से मिलकर कर रहे हैं। गहलोत के करीबियों पर विधायक दल की बैठक से ठीक पहले पड़े छापों ने इस बात पर और मोहर लगा दी। कुल मिलाकर गहलोत ये संदेश देने में कामयाब रहे कि पायलट उनके खिलाफ मोर्चा खोलकर केवल उन्हें ही नहीं बल्कि आलाकमान के निर्णय को भी चुनौती दे रहे हैं। वो भाजपा की राजस्थान सरकार गिराने की साजिश का हिस्सा बन चुके हैं।
गहलोत की राजनीतिक शतरंज पर चली गईं चालों में पायलट उलझ गए। वो अपने समर्थक विधायकों की अनुमानित संख्या भी साथ खड़े करने में कामयाब नहीं हो पाए… तो आलाकमान ये भरोसा भी नहीं दिला पाए कि वो भाजपा की साजिश का हिस्सा नहीं हैं। इसी का नतीजा है कि पायलट खुद की कुर्सी गवांने के साथ ही अपने दो साथियों विश्वेन्द्र सिंह और रमेश मीणा का मंत्री पद छिनवा चुके हैं। साथ ही विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस के बाद खुद उनकी और बाकी 18 विधायकों की सदस्यता पर भी खतरा आ गया है। नियम और प्रक्रियाओं के चलते इस पर तो सवाल हो सकते हैं लेकिन निस्संदेह पायलट बुरी तरह फंस चुके हैं। आज की तारीख में ना उनके साथ सरकार गिराने लायक संख्या बल दिख रहा और ना ही कांग्रेस से अलग होकर अपना अलग दल बनाने लायक। भाजपा में शामिल होने से तो तो वो बार-बार इनकार कर ही रहे हैं।
गहलोत की शह से मात खाने से बचने के लिए पायलट क्या चाल चलते हैं? इसी का सभी को इंतजार है। इंतजार इसलिए भी है कि पायलट का पूरा राजनीतिक भविष्य दांव पर है। क्या वो इस तरह की परिस्थितियों का पूर्वानुमान लगा कर निकले थे या नहीं… इसका भी पता चलना है। अगर भाजपा का साथ उनको है तो यह भी स्पष्ट है कि कि गहलोत की शह से बचने में पायलट को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के चतुर दिमाग का साथ भी मिलेगा।
ऐसे में ये पूरी लड़ाई अशोक गहलोत और अमित शाह के राजनीतिक चातुर्य के बीच की हो जाएगी। वैसे यह नहीं भूलना चाहिए कि गहलोत गुजरात के राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल को जीत दिलवाकर एक बार शाह को मात दे चुके हैं। लेकिन यहां बात एक दिन की नहीं बल्कि केंद्र से पंगा लेकर पूरे पांच साल सरकार चलाने की है। निश्चित ही गहलोत को भी इस बात एहसास तो होगा ही। यूं गहलोत को राजस्थान की राजनीति में मोहन लाल सुखाड़िया और भैरोंसिंह शेखावत के बाद सबसे बड़ा चतुर राजनीतिज्ञ माना जाता है। ऐसे में ये उनके राजनीतिक कौशल की एक और परीक्षा होगी।
राजस्थान के ताज़ा राजनीतिक घटनाक्रम पर जयपुर से वरिष्ठ पत्रकार मनोज माथुर का राजनीति विश्लेषण













