नारी शक्ति वंदन अधिनियम: संसद में क्यों फेल हुआ मोदी सरकार का ‘मास्टरस्ट्रोक’? समझें वो 4 वजहें जिससे बिगड़ा गणित

नई दिल्ली: केंद्र की मोदी सरकार के लिए शुक्रवार का दिन संसदीय इतिहास में एक बड़े झटके की तरह रहा। भारी गहमागहमी के बीच पेश किया गया ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण बिल) लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण गिर गया। यह पहला मौका था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार किसी महत्वपूर्ण विधेयक को सदन में पास कराने में विफल रही। जो भाजपा अपनी सटीक रणनीति के लिए जानी जाती है, आखिर वहां चूक कहां हुई? आइए जानते हैं उन प्रमुख कारणों को जिन्होंने सरकार का समीकरण बिगाड़ दिया।

1. दो-तिहाई बहुमत का ‘जादुई आंकड़ा’ पड़ा भारी

संसद में किसी सामान्य विधेयक को पास कराना और संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने में बड़ा अंतर होता है। महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान में बदलाव की आवश्यकता थी, जिसके लिए सदन में ‘विशेष बहुमत’ यानी उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई वोटों की जरूरत होती है। हालांकि NDA के पास पूर्ण बहुमत है, लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई का आंकड़ा उनके पास अकेले नहीं था। विपक्षी दलों के कड़े रुख के कारण सरकार यह संख्या बल नहीं जुटा सकी।

2. जनगणना और परिसीमन की ‘शर्त’ पर फंसा पेंच

इस बिल के साथ जुड़ी सबसे बड़ी शर्त यह थी कि आरक्षण तभी प्रभावी होगा जब देश में अगली जनगणना और उसके बाद सीटों का ‘परिसीमन’ (Delimitation) होगा। सरकार का तर्क था कि यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन विपक्ष इसे ‘चुनावी जुमला’ बताने लगा। कांग्रेस और इंडिया (INDIA) गठबंधन के दलों का आरोप है कि सरकार इस बहाने आरक्षण को 2029 या उससे भी आगे टालना चाहती है। विपक्ष की मांग थी कि आरक्षण को बिना किसी शर्त के तुरंत लागू किया जाए।

3. ‘कोटा के भीतर कोटा’ की उठती मांग

सदन में चर्चा के दौरान ‘सामाजिक न्याय’ का मुद्दा सबसे ज्यादा गरमाया रहा। विपक्षी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मांग की कि 33% आरक्षण के भीतर OBC और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा सुनिश्चित किया जाए। विपक्ष इसे जाति जनगणना से जोड़ने पर अड़ा रहा। दूसरी ओर, सरकार ने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान नहीं है और OBC कोटे की मांग पर भी असहमति बनी रही, जिससे वोटिंग के दौरान विपक्ष एकजुट होकर विरोध में खड़ा हो गया।

4. दक्षिण बनाम उत्तर: सीटों के नुकसान का डर

बिल के गिरते ही एक नया क्षेत्रीय विवाद भी गहरा गया है। दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु की DMK) का मानना है कि यदि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उनकी सीटें कम हो सकती हैं क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है। इसके उलट, उत्तर भारत के राज्यों का दबदबा संसद में बढ़ जाएगा। दक्षिण के दलों ने इसे अपनी राजनीतिक ताकत के खिलाफ एक बड़ी साजिश करार दिया, जिसने बिल के खिलाफ माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

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