तेल पर रूस का सख्त रुख: अब सस्ता नहीं महंगा तेल बेचेंगे पुतिन, भारत के लिए बढ़ेगी मुश्किलें !

मॉस्को/नई दिल्ली: पिछले चार वर्षों से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ‘सुरक्षा कवच’ बना सस्ता रूसी तेल अब अपनी चमक खो चुका है। मिडिल ईस्ट में जारी भीषण युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में पैदा हुई अस्थिरता ने वैश्विक तेल बाजार के समीकरणों को पूरी तरह पलट दिया है। ताज़ा रिपोर्ट्स के अनुसार, जो रूसी तेल भारत को भारी डिस्काउंट पर मिलता था, वह अब ‘स्कैरसिटी प्रीमियम’ (किल्लत की ऊंची कीमत) पर मिल रहा है। स्थिति इतनी गंभीर है कि अब रूसी तेल अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की तुलना में भी महंगा हो गया है।

डिस्काउंट का दौर खत्म, अब चुकानी पड़ रही है ‘प्रीमियम’ कीमत

साल 2022 में जब यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था, तब रूस भारत को प्रति बैरल 15 से 30 डॉलर तक की भारी छूट दे रहा था। लेकिन मार्च और अप्रैल 2026 की डिलीवरी के लिए हालात बिल्कुल उलट चुके हैं। अब रूसी तेल ब्रेंट क्रूड से भी लगभग 4-5 डॉलर प्रति बैरल महंगा मिल रहा है। चूंकि ब्रेंट क्रूड खुद 92 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुका है, ऐसे में भारत के लिए कच्चा तेल खरीदना अब तक का सबसे महंगा सौदा साबित हो रहा है।

मिडिल ईस्ट संकट ने बढ़ाई रूस की मांग, रिफाइनरियां मजबूर

इस मूल्य वृद्धि के पीछे मुख्य कारण खाड़ी देशों (Middle East) से होने वाली आपूर्ति का बाधित होना है। युद्ध के कारण लगभग 14 लाख बैरल तेल की सप्लाई चेन टूट गई है। भारतीय रिफाइनरियों के पास अपनी अनिवार्य जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस की ओर रुख करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। इसी मजबूरी का फायदा उठाते हुए रूसी निर्यातकों ने कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी कर दी है।

अमेरिका की ‘पलटी’ और रूस की चालाकी

इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की बदलती कूटनीति ने भी आग में घी डालने का काम किया है। जो अमेरिका पहले भारत-रूस तेल व्यापार पर आपत्ति जताता था, वही अब वैश्विक बाजार में कीमतों को संतुलित करने के लिए भारत से रूसी तेल खरीदने की ‘गुजारिश’ कर रहा है। जैसे ही रूस को संकेत मिला कि पश्चिम को भी रूसी तेल की सप्लाई की सख्त जरूरत है, उसने तुरंत दरों में इजाफा कर दिया।

रसद और बीमा खर्च ने तोड़ी कमर: केप ऑफ गुड होप का लंबा चक्कर

तेल की कीमतों के अलावा, ट्रांसपोर्टेशन और रसद की लागत ने भी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण जहाजों को लाल सागर (Red Sea) के बजाय केप ऑफ गुड होप (अफ्रीका के नीचे से) होकर आना पड़ रहा है।

इस लंबे रास्ते की वजह से:

  • माल ढुलाई (Freight) का खर्च कई गुना बढ़ गया है।

  • समुद्री बीमा (Marine Insurance) की दरें आसमान छू रही हैं।

  • पहुंचने के समय में 15-20 दिनों का इजाफा हो गया है।

भारतीय जेब पर क्या होगा असर?

सस्ते रूसी तेल ने कोरोना काल के बाद भारत के राजकोषीय घाटे को संभालने में बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन अब यूराल्स तेल की कीमतों में उछाल से घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर रखना सरकार के लिए लगभग नामुमकिन होगा। इसका सीधा असर भारतीय रुपये की वैल्यू और बढ़ती महंगाई (Inflation) पर पड़ना तय है, जो आम आदमी की रसोई के बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

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