Ayodhya Ram Mandir Cash Scam: चंपत राय के ड्राइवर की हनक और बैंक कर्मियों का फिक्स कमीशन; राम मंदिर चंदा चोरी में सामने आया ‘मास्टरमाइंड’ का पूरा नेक्सस

अयोध्या। अयोध्या के राम मंदिर में सामने आए ऐतिहासिक चढ़ावा महाघोटाले में हर रोज पुलिस और विशेष जांच टीम (SIT) की तफ्तीश में ऐसे सनसनीखेज खुलासे हो रहे हैं, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। अब तक की जांच में यह साफ हो चुका है कि यह कोई मामूली चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित गिरोह (Organized Gang) द्वारा सोची-समझी साजिश के तहत करोड़ों रुपये के गबन का एक बड़ा नेटवर्क था। इस पूरे खेल का मुख्य केंद्र बिंदु श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय के ड्राइवर रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव और गणना इंचार्ज सुभाष श्रीवास्तव की जुगलबंदी थी। पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, बैंक अधिकारियों से लेकर ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों की भूमिका पर शक का दायरा और गहराता जा रहा है।

ट्रस्ट में नहीं था कोई पद, फिर भी चंपत राय के ड्राइवर की हनक के आगे झुकती थी सुरक्षा

जांच में सामने आया है कि मुख्य आरोपी रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव का ट्रस्ट या मंदिर प्रबंधन की किसी भी आधिकारिक इकाई में कोई पद या सदस्यता नहीं थी। इसके बावजूद, चंपत राय का करीबी और ड्राइवर होने के नाते मंदिर परिसर के भीतर उसकी हनक और दबदबा सातवें आसमान पर था। राम मंदिर प्रबंधन के हर छोटे-बड़े कार्य में टिन्नू का सीधा हस्तक्षेप रहता था। उसकी हनक का आलम यह था कि मंदिर के अति-सुरक्षित क्षेत्रों में भी सुरक्षाकर्मी उसके आने-जाने या गतिविधियों पर कभी कोई सवाल उठाने की हिम्मत नहीं करते थे। इसी असीमित पावर और प्रशासनिक अनदेखी का फायदा उठाकर इस पूरे काले साम्राज्य को खड़ा किया गया।

गणना इंचार्ज ने बुना जाल, ड्राइवर ने एंट्री कराई ‘अपने बंदों’ की

इस संगठित लूट का ब्लूप्रिंट नोटों की गिनती के इंचार्ज सुभाष श्रीवास्तव ने टिन्नू यादव के साथ मिलकर तैयार किया था। साजिश के तहत, टिन्नू ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर नोटों की गिनती वाले बेहद संवेदनशील कमरे में अपने खास लोगों और करीबियों की एंट्री करवाई। इसके बाद शुरू हुआ रामलला के चढ़ावे और करोड़ों रुपये की नकदी को पार करने का एक ऐसा सिलसिला, जो किसी के टोकने के डर के बिना पिछले कई वर्षों से लगातार बैकग्राउंड में चल रहा था।

चाबियां टिन्नू के पास, ड्यूटी लगाने में सुभाष की मनमानी; ऐसे बेखौफ चलता था खेल

गिरोह के सदस्यों को पकड़े जाने का रत्ती भर भी खौफ नहीं था, क्योंकि पूरी व्यवस्था पर इन्हीं का कंट्रोल था।

  • कंट्रोल और चाबियां: मंदिर की दान पेटियों से लेकर कैश रूम की मुख्य चाबियां तक टिन्नू यादव के पास सुरक्षित रहती थीं।

  • मनपसंद टीम की तैनाती: गणना इंचार्ज होने के नाते सुभाष श्रीवास्तव बिना किसी रोक-टोक या आंतरिक ऑडिट के रोजाना नोट गिनने के काम में लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, मनीष यादव, अविनाश शुक्ला और रमाशंकर मिश्र जैसे अपने ही गैंग के लोगों की ड्यूटी लगाता था।

  • बंटवारे का फिक्स पैटर्न: पूरी टीम मिलकर हाईटेक सीसीटीवी कैमरों के सामने बेखौफ होकर नोटों की गड्डियां पार करती थी और काम खत्म होने के बाद पूरी रकम को एक निश्चित हिस्सेदारी के तहत आपस में बांट लिया जाता था।

बैंक अधिकारियों का था ‘फिक्स हिस्सा’, खुद भी करते थे सीधी चोरी

एसआईटी की तफ्तीश में जो सबसे चौंकाने वाला और नया मोड़ आया है, वह है बैंक कर्मियों की संलिप्तता। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, इस महाघोटाले में केवल मंदिर के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि दान के पैसे को मैनेज करने वाले बैंक के अधिकारी और कर्मचारी भी पूरी तरह शामिल थे। टिन्नू यादव और सुभाष श्रीवास्तव इन बैंक कर्मियों को चुप रहने और वाउचर में हेराफेरी करने के बदले हर बार एक मोटी रकम और फिक्स कमीशन दिया करते थे। एसआईटी को ऐसे पुख्ता साक्ष्य (Evidence) भी मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि कई मौकों पर बैंक कर्मियों ने खुद भी दान की बड़ी रकम को सीधे तौर पर पार किया था।

क्या मिलीभगत थी या घोर लापरवाही? शक के घेरे में ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारी

हाई-टेक सुरक्षा और सीसीटीवी कैमरों की निगरानी के बावजूद सालों तक करोड़ों रुपये की लूट होना बिना किसी आंतरिक संरक्षण के मुमकिन नहीं माना जा रहा है। यही वजह है कि ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों पर भी शक की सुई लगातार घूम रही है। हालांकि, मौजूदा एफआईआर में अभी तक सीधे तौर पर किसी शीर्ष पदाधिकारी का नाम शामिल नहीं किया गया है, लेकिन एसआईटी और पुलिस चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा की भूमिका की गहराई से जांच कर रही है। सोमवार को जब कोर्ट खुलेगी और पुलिस इन आरोपियों को कस्टडी रिमांड पर लेकर आमने-सामने पूछताछ करेगी, तब यह पूरी तरह साफ हो पाएगा कि यह ट्रस्ट के पदाधिकारियों की घोर लापरवाही थी या फिर इस सिंडिकेट में उनकी भी कोई अंदरूनी मिलीभगत थी।

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