कोलकाता: पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में आज 4 मई का दिन एक नए अध्याय के रूप में दर्ज होने जा रहा है। महीनों तक चले तीखे चुनावी वाकयुद्ध, हिंसक झड़पों और आरोपों-प्रत्यारोपों के दौर के बाद आज आखिरकार मतगणना का दिन आ गया है। सुबह 8 बजे से शुरू होने वाली इस काउंटिंग से साफ हो जाएगा कि क्या ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रहेंगी या फिर बीजेपी ‘सोनार बांग्ला’ के संकल्प के साथ पहली बार राज्य की कमान संभालेगी। बंगाल की 294 सीटों में से 10 ऐसी हॉट सीटें हैं, जिनके नतीजे न केवल दिग्गजों की साख तय करेंगे, बल्कि राज्य के भविष्य की दिशा भी निर्धारित करेंगे।
भवानीपुर और नंदीग्राम: साख और प्रतिशोध की सबसे बड़ी जंग
बंगाल के इस रण में सबसे बड़ा नाम भवानीपुर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने इस पुराने राजनीतिक किले से चुनाव लड़ रही हैं, जहां उनके सामने बीजेपी के कद्दावर नेता सुवेंदु अधिकारी की चुनौती है। 2021 में नंदीग्राम से हार के बाद ममता ने यहीं से उपचुनाव जीतकर मुख्यमंत्री पद सुरक्षित किया था। वहीं, नंदीग्राम आज भी राज्य की राजनीति का केंद्र बना हुआ है। 2007 के आंदोलन की इस धरती पर इस बार सुवेंदु अधिकारी टीएमसी के ‘पवित्र कर’ का सामना कर रहे हैं। नंदीग्राम का परिणाम यह तय करेगा कि क्षेत्र में अधिकारी परिवार का दबदबा कायम रहता है या नहीं।
डायमंड हार्बर और पानीहाटी: प्रतिष्ठा और भावनात्मक लहर का इम्तिहान
डायमंड हार्बर सीट टीएमसी के लिए महज एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी के ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की प्रतिष्ठा का सवाल है। अगर यहाँ से पार्टी को झटका लगता है, तो यह पार्टी के भविष्य के नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती होगी। दूसरी ओर, पानीहाटी सीट इस बार भावनात्मक लहर के केंद्र में है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना के बाद पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ के चुनाव लड़ने से यह सीट ममता सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से की सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है।
भांगर और संदेशखाली: ध्रुवीकरण और महिला सुरक्षा की लड़ाई
भांगर में इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के नौशाद सिद्दीकी की मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद तनावपूर्ण बना दिया है। वहीं, संदेशखाली में स्थानीय स्तर पर हुए विवादों के बाद यह सीट महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के खिलाफ बीजेपी के सबसे बड़े चुनावी हथियार के रूप में उभरी है। सुंदरबन डेल्टा के इस इलाके में महिला वोटर्स का रुख ही हार-जीत का फैसला करेगा।
खड़गपुर सदर से बालुरघाट तक: औद्योगिक बेल्ट और सीमावर्ती इलाकों का मिजाज
खड़गपुर सदर में ‘दो दादाओं’—बीजेपी के दिलीप घोष और टीएमसी के प्रदीप सरकार के बीच वर्चस्व की जंग है। वहीं, मुर्शिदाबाद में अधीर रंजन चौधरी की अगुवाई में कांग्रेस अपने पुराने गढ़ को बचाने की कोशिश कर रही है। कोलकाता पोर्ट में फिरहाद हकीम की साख दांव पर है, जहाँ त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है। अंत में, बांग्लादेश सीमा से सटे बालुरघाट में सुकांत मजूमदार और अर्पिता घोष की टक्कर यह बताएगी कि सीमावर्ती इलाकों में किसका जादू चला है।














